Dhirubhai Ambani – धीरुभाई अंबानी की पुण्यतिथि,कौन कहता है की सपनें देखना गलत होता है

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कौन कहता है की सपनें देखना गलत होता है, या सपने देखने आसान है लेकिन उनहें पूरा करना बहुत मुश्किल। इऩ सभी बातों को गलत साबित किया है धीरुभाई अंबानी ने दिनकी आज पुण्यतिथि है। धीरुभाई अंबानी आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उन्होंने जो सपना देखा वो पूरा किया आज वो हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके बनाए गए सपनों की प्रतिमा अंबानी फैमिली के रुप में पूरे देश के सामने है।
लोगों को जोड़कर रखना थी उनकी काबलियत

धीरुभाई अंबानी की सबसे बड़ी काबलियत थी, की वो लोगों को जोड़कर रखते थे और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। धीरुभाई ने जूनागढ़ में नवाब के विरोध में खड़े होकर देश की आजादी का झण्डा लहराया था। जब उन्होंने लोगों के सामने पहली बार भाषण दिया था, तभी से वो लोगों के सामने हिरो बन गए थे।

कौन थे धीरुभाई अंबानी

धीरुभाई का जन्म 28 दिसंबर 1932 को जूनागढ़ के चोरवाड़ गांव में हुआ था। किसने सोचा था की एक दिन वो देश की सबसे बड़ी कंपनी खड़ी कर देगें। धीरुभाई का मन पढ़ाई में बिल्कुल भी नहीं लगता था। उनका दिमाग शुरु से ही धन्धा, सामाजिक कार्य और राजनीति में लगता था। पिता की तबीयत खराब होने के कारण धीरुभाई ने ताल बेचकर पकोड़े की दुकान लगाई और घर के खर्चे में हाथ बटाया।

कैसी हुई इनके करियर की शुरुआत

सबकुछ पीछे छोड़ धीरुभाई एक बार यमन के पोर्ट एडेन पहुंचे, एडेन दुनिया का सबसे व्यस्त एयरपोर्ट था। अपनी नौकरी उन्होंने वहां क्लर्क के तौर शुरू की। जब धीरु भाई वहां के सबसे बड़े ट्रेडिंग फर्म ए। बेसेस एंड कंपनी से जुड़े तो धीरूभाई ने होलसेल बिजनेस, इंपोर्ट-एक्सपोर्ट, मार्केटिंग, सेल्स, होलसेल बिजनेस और डिस्ट्रीब्यूशन की छोटी-बड़ी सभी चीजें सीखी। इसके अलावा उन्होंने वहां बहुत कुछ सीखा। धीरे-धीरे उन्हें ये समझ में आ गया था कि ट्रेडिंग में काफी रुचि है।

 

विवाह के बाद बदली किस्मत

सन 1954 में धीरूभाई ने कोकिला बेन से विवाह किया। जिसके पश्चात् उनके जीवन में बदलाव हुआ। कंपनी ने धीरूभाई को एडेन में शुरू होने वाली शेल ऑयल रिफाइनरी कंपनी में काम करने के लिए एडेन भेजा। वहीं से धीरूभाई ने अपनी रिफाइनरी कंपनी शुरु करने का सपना तय कर लिया था। लम्बे समय के बाद वो 50 के दशक में एडेन से देश वापस लौटे।

पहले शुरु कि रिलायंस कंपनी फिर बने टेक्सटाइल मालिक

धीरुभाई थोड़े में नहीं जीना चाहते थे उन्हें वो सब करना था जो उन्होंने अपनी नौकरी के दौरान सोचा था। वापस आने के बाद धीरुभाई ने अरब के व्यापारियों से मिलकर उन्हें चीनी, मसाला जैसे चीजें निर्यात करने लगे। उसके कुछ समय बाद उन्होंने थोक कारोबार शुरू किया। इसके बाद ही रिलायंस कमर्शियल कॉरपोरेशन की नींव पड़ी। अब धीरूभाई ने अपने कारोबार पूरी तरह से जमा लिया। अब धीरूभाई ने टेक्सटाइल का काम शरु करने का सोचा। नरोदा से उन्होंने अपना पहला टेक्सटाइल कारोबार शुरु किया। जो कपड़ा विमल ब्रांड के नाम से जाना जाता था। रास्ता इतना आसान नहीं था, अन्य मील मालिकों ने उनके काम का कई बार विरोध भी किया। इसके बाद उनकी कामयाबी कोई रोक नहीं और 1970 के दशक तक कंपनी का कुल टर्नओवर 70 करोड़ हो गया। 2002 तक कंपनी का टर्नओवर 75,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। आज वो नहीं है लेकिन इनकी कंपनी आज भी सबसे बड़ी कंपनी है। जिसकी शरुआत धीरुभाई ने कि थी वो हमेशा आगे ही बढ़ती रही।